आध्यात्मिक जगत में आपका स्वागत है
इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि मानव हर क्षेत्र में तरक्की हासिल कर रहा है| पर भौतिकता की दौड़ में पड़कर इंसानियत को भूलता जा रहा है| उसका तन-मन निरंतर इसी दौड़ में विचरण करता रहता है| आध्यात्मिकता दिनों-दिन दूर नजर आ रही है| इंसान का मन चैन व सकून चाहता है परन्तु भोतिकता की दौड़ में पड़कर चाहते हुए भी अपने कुछ पलों को इस हरि परमेश्वर को नहीं दे पा रहा|
कार्य की व्यवस्ता व समय के अभाव में भी वह बैठे - बैठे ही अपने कुछ पलों को इस परमात्मा से जोड़ सकता है| यह वेबसाइट भी उसी का एक प्रयास है| क्योंकि कोई एक संदेश, शिक्षाप्रद कहानी कहीं न कहीं आपके दिल को छुह सकती है और जीवन को नई दिशा प्रदान कर सकती है| अध्यात्म: 'अध्य' जिसका अर्थ है - परम आत्मा अर्थात् ईश्वर के समतुल्य व्यक्ति की आत्मा से सम्बन्धित ज्ञान| अध्यात्म के अन्तर्गत आत्मा एवं परमात्मा के सम्बन्धों का ज्ञान शामिल है|
हिन्दी मानक कोश में अध्यात्म का अर्थ: परमात्मा, आत्मा, आत्मा तथा परमात्मा के गुणों एवं आन्तरिक सम्बन्धों के विषय में किए जाने वाला दार्शनिक चिन्तन, निरूपण या विवेचन से है|
आध्यात्मिकता: क्यों, कैसे, कब, कहाँ अर्थात् ब्रह्म, आत्मा व जीव के स्वरूप का विवेचन, जो भौतिक या लौकिक न हो शामिल है|
आध्यात्मिक: जब किसी व्यक्ति का लगाव अथवा रुझान परमात्मा के ज्ञान की ओर होता है तब वह लगाव अथवा रुझान या रूचि आध्यात्मिक बन जाती है|
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श्रीमद्भगवद्गीता (Srimad Bhagavad Gita)
श्रीमद्भगवद्गीता हिन्दू धर्म के पवित्रतम ग्रन्थों में से एक है। श्री कृष्ण ने गीता का सन्देश अर्जुन को सुनाया था। यह एक महाभारत के भीष्मपर्व के अन्तर्गत दिया गया एक उपनिषद है । इसमें एकेश्वरवाद, कर्म योग, ज्ञानयोग, भक्ति योग की बहुत सुन्दर ढंग से चर्चा हुई है। इसमें देह से अतीत आत्मा का निरूपण किया गया है।
श्रीमद्भगवद्गीता की पृष्ठभूमि महाभारत का युद्घ है। भारत वर्ष के ऋषियों ने गहन विचार के पश्चात जिस ज्ञान को आत्मसात किया उसे उन्होंने वेदों का नाम दिया। इन्हीं वेदों का अंतिम भाग उपनिषद कहलाता है। मानव जीवन की विशेषता मानव को प्राप्त बौद्धिक शक्ति है और उपनिषदों में निहित ज्ञान मानव की बौद्धिकता की उच्चतम अवस्था तो है ही, अपितु बुद्धि की सीमाओं के परे मनुष्य क्या अनुभव कर सकता है उसकी एक झलक भी दिखा देता है। उसी औपनिषदीय ज्ञान को महर्षि वेदव्यास ने सामान्य जनों के लिए गीता में संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत किया है। वेदव्यास की महानता ही है, जो कि ११ उपनिषदों के ज्ञान को एक पुस्तक में बाँध सके और मानवता को एक आसान युक्ति से परमात्म ज्ञान का दर्शन करा सके।
श्रीरामचरितमानस (Shri Ram Charitr Manas)श्री राम चरित मानस अवधी भाषा में गोस्वामी तुलसीदास द्वारा १६वीं सदी में रचा एक महाकाव्य है। रामचरितमानस को तुलसीदास ने सात काण्डों में विभक्त किया है। इन सात काण्डों के नाम हैं - बालकाण्ड, अयोध्याकाण्ड, अरण्यकाण्ड, किष्किन्धाकाण्ड, सुन्दरकाण्ड, लंकाकाण्ड और उत्तरकाण्ड। छन्दों की संख्या के अनुसार अयोध्याकाण्ड और सुन्दरकाण्ड क्रमशः सबसे बड़े और छोटे काण्ड हैं। तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में हिंदी के अलंकारों का बहुत सुन्दर प्रयोग किया है विशेषकर अनुप्रास अलंकार का। रामचरितमानस पर प्रत्येक हिंदू की अनन्य आस्था है और इसे हिंदुओं का पवित्र ग्रंथ माना जाता है। |
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